50 साल बाद नहीं दिखेंगे कल्याण-मुलायम के ‘दांव’, लोकसभा चुनाव में नहीं दिखेगी अजित सिंह की हुंकार

साल 2024 के चुनावी उत्सव का मौसम शुरू हो चुका है। यूपी की सियासी जमीन पर इस बार कहीं खेमे बदले हैं तो कहीं चेहरे। इन बदलावों को वोटर अपनी कसौटी पर कसेंगे। इस बार यूपी की राजनीति की दिशा तय करने वाले कुछ नाम भी सियासत के मंच पर दिखाई नहीं देंगे। करीब चार दशक तक अपने दांव पेचों से विरोधियों को पटखनी देने वाले मुलायम-कल्याण के दिवंगत होने से उपजी शून्यता के भी ये चुनाव साक्षी होंगे।

जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। कल्याण सिंह तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। अजीत सिंह आए हैं, हरित प्रदेश लाए हैं। इस दफा के लोकसभा चुनाव में ये जोशीले नारे सुनने को नहीं मिलेंगे। समाजवादी पार्टी ‘पीडीए’ के जरिए ‘मंडल’ और भारतीय जनता पार्टी राममंदिर के जरिए ‘कमंडल’ की राजनीति को फिर गर्माने में लगी है। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन मुद्दों से दो बड़े राजनीतिक चेहरे मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह उपजे थे।

90 के दशक से ब्रज समेत संपूर्ण उत्तर प्रदेश की राजनीति मुलायम और कल्याण के ईदगिर्द ही घूमती रही। अगस्त 2021 में कल्याण सिंह तो अक्तूबर 2022 में मुलायम सिंह यादव का निधन हो गया। सपा की स्थापना के बाद मुलायम की गैर-मौजूदगी में पार्टी का यह पहला चुनाव होगा। वहीं, तीन दशक से हर लोकसभा चुनाव में भागीदारी करने वाले रालोद मुखिया रहे चौधरी अजित सिंह का तीन साल पहले निधन हो चुका है। उनके बेटे जयंत इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे। 1971 के बाद यह पहली बार है जब चौधरी खानदान का कोई चेहरा लोकसभा चुनाव में नहीं उतरेगा।

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