स्वामी रामदेव, डॉ. अशोक चक्रधर, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ सहित देश-विदेश के साहित्यकारों ने हिंदी के वैश्विक विस्तार का किया आह्वान - uttarakhandkihunkar.in

स्वामी रामदेव, डॉ. अशोक चक्रधर, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ सहित देश-विदेश के साहित्यकारों ने हिंदी के वैश्विक विस्तार का किया आह्वान

उत्तराखंड(देहरादून),मंगलवार 27 अक्टूबर 2026

लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव–2026 के तृतीय दिवस का शुभारंभ हिंदी, भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक अस्मिता पर सार्थक विमर्श के साथ हुआ। इस अवसर पर हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने तथा संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में सम्मिलित कराने के उद्देश्य से एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया। देश-विदेश से पधारे साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषाविदों ने शिक्षा, प्रशासन, सिनेमा, मीडिया एवं डिजिटल माध्यमों में हिंदी के व्यापक प्रयोग तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण पर बल दिया।

योगऋषि एवं पतंजलि योगपीठ के संस्थापक परम पूज्य स्वामी रामदेव जी ने लेखक गाँव की सराहना करते हुए कहा कि वे पहली बार यहाँ आए हैं और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी के स्नेह ने उन्हें इस सुंदर परिसर तक खींच लाया है। उन्होंने कहा कि लेखक गाँव साहित्य, संस्कृति और प्रकृति के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। डॉ. निशंक बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं और हिमालय के जल, जंगल, जीवन एवं पर्यावरण के प्रति उनका असाधारण प्रेम उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है।

स्वामी रामदेव जी ने कहा कि हिंदी के प्रति जन-जन में प्रेम जगाना समय की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा हिंदी में कार्य करने और उसे प्रोत्साहित करने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भाषा के प्रति सम्मान राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार है। उन्होंने कहा कि भारत को जानने के लिए हिंदी और भारतीय संस्कृति की गहराई समझने के लिए संस्कृत से जुड़ना आवश्यक है। भारत को विश्व का श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने का संकल्प अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक जड़ों के सम्मान से ही साकार होगा।

सुप्रसिद्ध कवि एवं पद्मश्री डॉ. अशोक चक्रधर ने हिंदी और भारतीय भाषाओं की एकता तथा देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की समृद्ध परंपरा दी है। हिंदी का सम्मान अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने हिंदी को व्यापक जनसंवाद की सशक्त कड़ी बताते हुए प्रस्ताव के समर्थन में सामूहिक संकल्प लेने का आह्वान किया।

उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे ने इस पहल की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि सामूहिक प्रयासों से हिंदी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में सार्थक प्रगति होगी।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि हिंदी अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो सहित अनेक देशों में प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच हिंदी जीवंत सांस्कृतिक संपर्क-भाषा है। सिनेमा, फिल्म-संगीत, मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाई है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि लेखक गाँव इस दिशा में निरंतर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय के विशिष्ट भारतविद् प्रो. (डॉ.) हाइंस वर्नर वेसलर ने हिंदी में अपने विचार रखते हुए कहा कि विदेशी विद्यार्थियों के लिए हिंदी शिक्षण को अधिक व्यावहारिक और समकालीन बनाया जाना चाहिए। हिंदी के साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य का अध्ययन भी विदेशों में प्रोत्साहित होना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का स्थान दिलाने के लिए निरंतर कूटनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।

ऑस्ट्रेलिया से पधारे अभिनेता, एंकर एवं सांस्कृतिक अध्येता श्री चार्ल्स थॉमसन ‘बिहारी लाल’ ने “जय भारत, जय हिंदी” के उद्घोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए अपनी मातृभाषाओं के प्रति सम्मान और आत्मविश्वास आवश्यक है। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में बढ़ावा देने का आह्वान किया।

बुल्गारिया के सोफिया विश्वविद्यालय की लेखिका, शिक्षाविद् एवं इंडोलॉजी की प्रोफेसर मौना कौशिक ने कहा कि विश्व के अनेक देशों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। अब आवश्यकता है कि हिंदी अकादमिक संस्थानों से आगे बढ़कर जन-जन की भाषा बने। उन्होंने साहित्यिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी का वैश्विक विस्तार करने पर बल दिया।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने सभी वक्ताओं के विचारों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी का संवर्धन प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में दिए गए संबोधनों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी सहित अनेक जनप्रतिनिधियों द्वारा हिंदी में आधिकारिक कार्यों को प्रोत्साहित किए जाने का भी उल्लेख किया।

डॉ. निशंक ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करती है और विविध भाषायी समुदायों को जोड़कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाती है। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके सम्मान, संरक्षण और समृद्धि के साथ होना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए व्यापक जनसमर्थन, अंतरराष्ट्रीय संवाद और संस्थागत प्रयासों का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि लेखक गाँव साहित्य, संस्कृति, प्रकृति और भारतीय ज्ञान-परंपरा का संगम है, जो हिंदी एवं भारतीय भाषाओं को वैश्विक मंच प्रदान करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने हिंदी के संरक्षण, संवर्धन और विकास के लिए योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि लेखक गाँव देश-विदेश के हिंदीप्रेमियों को जोड़ने का महत्त्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध कथाकार एवं एम.बी.ई. सम्मान से अलंकृत श्री तेजेंद्र शर्मा ने कहा कि हिंदी को उसका अपेक्षित स्थान दिलाने के लिए शांतिपूर्ण, तार्किक और सकारात्मक जनजागरण आवश्यक है। उन्होंने लेखक गाँव की पहल की सराहना करते हुए हिंदी के महत्त्व पर समाज और जनप्रतिनिधियों के बीच व्यापक संवाद का आह्वान किया।

नीदरलैंड से पधारे श्री रमा तक्षक ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रस्ताव पर विचार रखे। अंडमान से आईं तमिल भाषाविद् डॉ. एन. लक्ष्मी तथा मिजोरम से पधारे प्रो. सुशील शर्मा ने भी प्रस्ताव के प्रति समर्थन व्यक्त करते हुए भारतीय भाषाओं के बीच सहयोग और सांस्कृतिक एकता पर बल दिया।

लेखक गाँव की निदेशक विदुषी निशंक ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और विद्वानों का स्वागत करते हुए हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प से जुड़ने की अपील की।

लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव–2026 के इस विमर्श में हिंदी के वैश्विक विस्तार, भारतीय भाषाओं के समन्वय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करने का संदेश दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी की प्रतिष्ठा उसके व्यावहारिक प्रयोग, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, साहित्यिक समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयासों के साथ जनभागीदारी भी आवश्यक है।

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